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आँगन खुला है मेरे घर का

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आँगन खुला है मेरे घर का, पहरा आसमाँ का रहता है। कभी धूप आ जाती हैं मेहमान बनकर, तो कभी तारों का ठहराव रहता है। बारिश में तालाब बन जाता है, तो गर्मियों में तपती आग। ओस की बूंदें बड़ा इतराती है, फूल-पत्तों पर बैठे मन लुभाती है। मुँडेर पर बैठा कौआ भी संग पैगाम लाता है, इशारों-इशारों में बहुत कुछ कह जाता है मौसम कुछ सिखाता है, जिंदगी का पाठ पढ़ाता हैं। आँगन खुला है मेरे घर का, पहरा आसमाँ का रहता है। - पूजा डौरवाल

नयी पहचान

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जिसका इंतजार था वो आज मेरी गोद में हैं। वो नन्ही जान नयी पहचान मेरी गोद में हैं। ये नन्हा मेहमान आया तब से ही रोने में खोया है, फिर मेरी गोद में आकर सूकून से सोया है। रोता उसे देख मेरे भी आँसू टपकने लगे, मुझे ऐसे देख वो भी रोते-रोते हँसने लगे। उसमें बसी हमारी जान है,  अब तो उसके नाम से हमारी नयी पहचान है। वैसे अभी तो चल रही जाँच पड़ताल है, किसके जैसी आँखे या किसके जैसी मुस्कान है। जब उन नन्हें से लबों पर आती हँसी,  आँगन में बिखर जाती खुशी। उसके आने से इस घर की भी मिली नयी पहचान है, लगता है जैसे घर की जान में आयी जान है। अब हर रिश्ते को फिर से सँवारा जायेगा, सबको उसके नाम से जोड़कर पुकारा जायेगा। - पूजा डोरवाल

कौन नहीं चाहता

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कौन नहीं चाहता, वापस मिल जाये वो, एक रुपये वाली अमीरी। उस एक रुपये में, मिल जाती थी, खुशियाँ ढ़ेर सारी। कभी वो आती, रूठ जाने पर, तो कभी आ जाती, कुछ अच्छा कर जाने पर। गमों से थी दूरियाँ, खुशियों भरी थी दुनियाँ। बारिश के पानी में, कागज की नाँव सी, गर्मी की धूप में, माँ के आँचल की छाँव सी। कौन नहीं चाहता, वापस मिल जाये वो, एक रुपये वाली अमीरी। - पूजा डोरवाल

वक़्त इंतजार का

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ये वक़्त इंतजार का है, कहीं खत्म तो कहीं शुरू होते इंतजार का। कोई अरसे बाद घर पर रुका होगा, तो कोई वापस घर लौट आना चाहता होगा। कोई खुश है बच्चों के साथ वक़्त बिता कर,  तो कोई इंतजार कर रहा उस टपरी वाली शाम का। कोई बरसों बाद माँ की गोद में सो रहा होगा, तो कोई एक झलक कब मिलेगी सोच कर रो रहा होगा। किसी ने सुकून से परिवार के साथ खाना खाया होगा,  तो किसी को भूखे बच्चों का ख़्याल सताया होगा। कोई घर से काम कर रहा होगा,  तो कोई वापस काम पर लौटने की राह देख रहा होगा। किसी को अपनों के संग इतने दिन गुजारकर आंनद आया होगा,  तो किसी को अपनों से दुरियों के ख़्याल ने सताया होगा। ये वक़्त इंतजार का है, कहीं खत्म तो कहीं शुरू होते इंतजार का। - पूजा डौरवाल

टपकते मोती

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क़ुदरत का जादू तो है ही सबसे प्यारा, रोज़ हमारे कुछ ना कुछ दिल में बस जाने वाला जादुई नजारा देखने को मिल ही जाते है। और कभी-कभी तो इन नजारों में ऐसे खो जाते है वक़्त का पता ही नहीं चलता। अपार्टमेंट की पहली मंजिल की खिड़की से दूर-दूर के नजारे को चारदीवारी पर लगे ये पेड़ अपने पीछे छुपा लेते है, मानो जैसे ये कहने की कोशिश कर रहे हो कि आपको बस हम अपने जादू दिखाएंगे क्योंकि आप हमें बेहद पसंद हैं।  आप भी सोच रहे होंगे ये पेड़ क्या जादु दिखाएंगे पर ये पेड़ अकेले नहीं है इनके साथ देती है वो लाइटें एक शाम की बात है मैं अपने कमरे में बैठी थी अचानक बारिश के आवाज़ कानों में पड़ी। जब पर्दे हटा कर बाहर देखा तो जोरों से बारिश हो रही थी, अनायास ही मेरी नजरें कोने वाली लाईट पर पड़ी, लाइट की रौशनी में बारिश की बूंदें साफ दिख रही थी, पर अभी तो लाईट और बारिश की बूंदों का अपना मिलाजुला जादू दिखाना बाकी था। उस लाइट में दिखाई देती बूंदों में "एक चमकती बूँद टपकी" उसे देख कर ऐसा लगा जैसे उस लाइट से कोई मोती गिरा हो और वो पेड़ों के पत्ते लाइट के आसपास ऐसे मंडरा रहे थे जैसे वो हर उस मोती को अपनी झोली ...