आँगन खुला है मेरे घर का



आँगन खुला है मेरे घर का,
पहरा आसमाँ का रहता है।

कभी धूप आ जाती हैं मेहमान बनकर,
तो कभी तारों का ठहराव रहता है।

बारिश में तालाब बन जाता है,
तो गर्मियों में तपती आग।

ओस की बूंदें बड़ा इतराती है,
फूल-पत्तों पर बैठे मन लुभाती है।

मुँडेर पर बैठा कौआ भी संग पैगाम लाता है,
इशारों-इशारों में बहुत कुछ कह जाता है

मौसम कुछ सिखाता है,
जिंदगी का पाठ पढ़ाता हैं।

आँगन खुला है मेरे घर का,
पहरा आसमाँ का रहता है।

- पूजा डौरवाल

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